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Category Archives: हिंदी कविता रेखा पटेल

आसमान को छूना है मुझे
धरतीपे रहकर उड़ना है मुझे
सबका ज्यादा प्यार पाना है
तू जो दोस्ती में साथ दे.

सुना है बहुत मशहूर है तु,
साथ और बात निभाने में.
छूना है आसमाँ को मुझे
तू जो दोस्तीका रुख दे.

सब दुःखोंसे लड़ना है मुझे
कभी ना गिरने देना तु मुझे
बिना गिरे बहुत दूर जाना है.
तू दोस्तीकी सच्ची शिख दे.

सूना है वादोंपे मगरूर है तु,
साथ हारे को हौंसला देने में.
सब दुःखोंसे लड़ना है मुझे
तू दोस्तीका जो सुख दे.

रेखा पटेल ( विनोदिनी)25660331_1796401713727918_6646523681387347600_n

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हर सोचसे कहती हूँ, बस तुम्हें भूल चुकी हूँ
हर शाम कोयलकी कूहू तो कयूँ तडपाती है?
छोड़ दिया था कबसे रोज रोज का जलना
हर बार सावनकी बारिस फिर क्यूँ जलाती है?
अब ना देंगे इजाजत तुम्हे दिनमें सताने की,
हर रात पुरानी यादें सपनोंमे क्यूँ रुलाती है?
जितना भुलाना चाहा तुम् उतने पास आये हो.
हरवक्त बहती यादोंको,ना आँखे रोक पाती है.
शिकायत हम करे भी तो अब किसको करे,
हर राह ना कोई मंजिल तुम्हारा पता बताती है.
तुम्हे पाकर हर जिक्र में जहाँ पा लिया था
हर सुबह फिर खोकर वो अब सब्र जताती है.
रेखा पटेल(विनोदिनी)

 

तुम्हारा मन महकता गुलाब था
लेकिन! तुमने कभी.
इजहार नहीं किया !!

प्यार जताते नहीं
महसूस करते है!
तुमने यही सोचकर ….
मनके मीठे भावों को
मौन तले दबा कर रख दिया .

धीरे धीरे …
वो मौन वटवृक्ष बनकर
अपनी जड़ को
मजबूती से फैलाता गया !!
साथ वो प्यार भी ,
मेरे अंतर्मन की गुफामे
धसता चला गया !

समयको साक्षी मानकर
मैंने अपने ही हाथो ,
गुफाका द्वार बंद कर दिया !!!
जहा मैंने मन को,
बड़ी शिद्दत से छुपाया था,
कल रात वहा से आह सुनाई दी,
गौर सुना,
छोटा सा एक सपना
अबभी छटपटा रहा था
दो लब्जोको ढूढ रहा था.

रेखा पटेल(विनोदिनी

 

 

तूम अगर सामने हो मेरे, तो हर जगह ख़ास है.
वरना जैसे,समंदरके सामने पानी और प्यास है.

जिसे चाहे वो मिल जायें अगर, जीवन बाग़ है,
बाकी जिंदगी रुकती नहीं, जीनेका अहेसास है.

सपनोंको कहाँ ख़रीदा या बेचा जा सकता है,
किंमत लगती है वहाँ,जहाँ मिलन आस पास है.

जीने को जरुरी है तमन्नाओ को जिंदा रखना,
बुझे हुए दियेमें, यूँ तेल भरते जाना परिहास है.

वैसे ये जीवन,बहेते समंदर से आगे कुछ भी नहीं
जिन्दा लोग डूबते, मुर्दा फेंक देते कहते लाश है.

रेखा पटेल( विनोदिनी)

 

किसीने छूके मुझे अपना कहाँ रख्खा है

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किसीने छूके मुझे अपना कहाँ रख्खा है ?
जैसे अपने ही साँसो में सजा रख्खा है.

मिले तो ऐसे की जैसे हवा से फूल खिले
कहीसे बहते हुए झरनेमें तपती घुप मिले.
जैसे अपने ही चाहतमें कैद बना रख्खा है.

हमारा होश यूँ दिन रात जवां रख्खा है
किसीने छूके मुझे अपना कहाँ रख्खा है ?

कभी खयालोंमे,कभी सामने वो आता है
कभी सरगोसी से दिलको भी छेड़ जाता है
जैसे अपने ही प्यारमें सदा बसा रख्खा है

हमें ही नूर कभी मुजरिम बना रख्खा है
किसीने छूके मुझे अपना कहाँ रख्खा है ?
जैसे अपने ही साँसो में सजा रख्खा है
रेखा पटेल (विनोदिनी)

 

दिलकी किताब से निकालकर रचाई गई ग़ज़ल
वो सुगंघ जब फैली सबको मस्त कर गई ग़ज़ल.

ख़ुशी के आलममें जब यारोंको सुनाई गई ग़ज़ल,
उनकी पनाहमें फिर खुब चुलबुली बन गई ग़ज़ल.

ख़ुशीकी बात या गमकी कहानी दोहराई गजल,
कभी बारिस तो कभी घुपमें गुनगुनाई गई ग़ज़ल

भरकर सब्दोके रंग नूर नए यूँ रोज सजाई ग़ज़ल
लो बिना कागज कलम दिलोंको सजा गई ग़ज़ल

सब उम्मीद और इच्छायें शब्दो संग बहा गई ग़ज़ल
ज़िंदगी के पन्नोको आज फिर जिन्दा कर गई ग़ज़ल

रेखा पटेल ( विनोदनी )…

 

दिलकी किताब से निकालकर रचाई गई ग़ज़ल
वो सुगंघ जब फैली सबको मस्त कर गई ग़ज़ल.

ख़ुशी के आलममें जब यारोंको सुनाई गई ग़ज़ल,
उनकी पनाहमें फिर खुब चुलबुली बन गई ग़ज़ल.

ख़ुशीकी बात या गमकी कहानी दोहराई गजल,
कभी बारिस तो कभी घुपमें गुनगुनाई गई ग़ज़ल

भरकर सब्दोके रंग नूर नए यूँ रोज सजाई ग़ज़ल
लो बिना कागज कलम दिलोंको सजा गई ग़ज़ल

सब उम्मीद और इच्छायें शब्दो संग बहा गई ग़ज़ल
ज़िंदगी के पन्नोको आज फिर जिन्दा कर गई ग़ज़ल

रेखा पटेल ( विनोदनी )…