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मेरा मन ….

08 May

कभी मेरा मन महकता गुलाब था
लेकिन तुमने कभी भी ,
प्यार का इजहार नहीं किया !!

प्यार जतलाने की नहीं
महसूस करने की है!
यही सोचकर ….
तुमने अपने मनके भावों को
मौन तले दबा कर रख दिया .

धीरे धीरे …
वो मौन वटवृक्ष बनकर
अपनी जड़ को
मजबूती से फैला गया !!

तुम्हारा प्यार भी ,
मेरे अंतर्मन की गुफामे
घ्सता चला गया !
मैंने मन को अपने ही हाथो ,
गुफामे बंद में कर दिया !!!
एक डर था फिर से जागृत होनेका .

जहा मैंने मन को,
शिद्दत से दबाके रख्खा था ,
कल रात वहा से
किसीकी आहे सुनाई दी ,
वो मेरे सपने ही थे !!
जो प्यार के अभाव में
छटपटा रहे थे ….
रेखा ( सखी )

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