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तुम्हारा प्यार…

29 Apr
       
कभी मेरा मन महकता गुलाब था 
लेकिन तुमने कभी भी ,
 प्यार का इजहार नहीं किया !!
 
   प्यार जतलाने की नहीं
       महसूस करने की है!
यही सोचकर ….
तुमने अपने मनके भावों को 
मौन तले दबा कर रख दिया .
 
   धीरे धीरे …
  वो मौन वटवृक्ष बनकर
 अपनी जड़ को
   मजबूती से फैला गया !!
 
        तुम्हारा प्यार  भी ,
मेरे अंतर्मन की गुफामे 
  घ्सता चला गया !
मन को मैंने अपने ही हाथो ,
गुफामे बंद में कर दिया !!!
एक डर था फिर से जागृत होनेका .
 
जहा मैंने मन को,
शिद्दत से दबाके रख्खा था ,
कल रात वहा से 
किसीकी आहे सुनाई दी ,
वो मेरे सपने ही थे !!
जो प्यार के अभाव में
छटपटा रहे थे ….
रेखा ( सखी )
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Posted by on April 29, 2013 in Uncategorized

 

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